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Yog Darshan | Patanjali Yoga Sutra with Hindi Commentary | Gita Press Gorakhpur | Code 135 | Hindi Book

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योग दर्शन (Code 135) महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित योग-दर्शन पर आधारित महत्वपूर्ण भारतीय दार्शनिक ग्रंथ है। गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित यह हिंदी Paperback संस्करण हिंदी व्याख्या सहित प्रस्तुत किया गया है। उपलब्ध पुस्तक विवरणों में इसे Patanjali Yog Darshan, Code 135, हिंदी भाषा और Paperback के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

यह पुस्तक योग-दर्शन, भारतीय दर्शन, साधना, ध्यान, योगसूत्र और आध्यात्मिक अध्ययन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए उपयोगी संदर्भ पुस्तक है।

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योग दर्शन भारतीय दर्शन की महत्वपूर्ण परंपरा में आने वाला ग्रंथ है, जिसका संबंध महर्षि पतंजलि द्वारा व्यवस्थित किए गए योगसूत्रों से है। यह गीता प्रेस गोरखपुर का Code 135 संस्करण है और उपलब्ध पुस्तक-सूचनाओं के अनुसार इसमें हिंदी व्याख्या सहित योग-दर्शन प्रस्तुत किया गया है।

पतंजलि का योग-दर्शन केवल शारीरिक व्यायाम के अर्थ में योग की चर्चा नहीं करता, बल्कि चित्त, वृत्तियों, अभ्यास, वैराग्य, ध्यान, समाधि और आत्मानुशासन जैसे गहरे दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विषयों को व्यवस्थित रूप से सामने रखता है।

इस कारण यह पुस्तक योग को उसके दार्शनिक और आध्यात्मिक संदर्भ में समझने वाले पाठकों के लिए विशेष महत्व रखती है।


पतंजलि योग दर्शन क्या है?

भारतीय दर्शन की परंपरा में पतंजलि का योग-दर्शन मनुष्य के आंतरिक अनुशासन और चित्त की प्रकृति को समझने का एक व्यवस्थित मार्ग प्रस्तुत करता है।

योगसूत्रों में योग को प्रसिद्ध रूप से “चित्तवृत्तिनिरोध” के रूप में परिभाषित किया गया है। योग-दर्शन में साधक के लिए अभ्यास, वैराग्य, ध्यान और आत्मसंयम जैसे विषयों पर विचार किया जाता है।

इस दृष्टि से योग दर्शन केवल आसन या शारीरिक स्वास्थ्य की पुस्तक नहीं है। इसका प्रमुख क्षेत्र योग का दर्शन, साधना-पद्धति और चित्त के अनुशासन से संबंधित है।


योग दर्शन के प्रमुख विषय

पतंजलि के योगसूत्रों की पारंपरिक संरचना चार पादों में मानी जाती है:

1. समाधि पाद

इस भाग में योग की प्रकृति, चित्त और उसकी वृत्तियों तथा समाधि से संबंधित मूलभूत विषयों पर विचार किया जाता है।

2. साधना पाद

साधना से संबंधित विषयों के साथ क्रियायोग और अष्टांग योग का महत्वपूर्ण विवेचन मिलता है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि योग की साधना-पद्धति के प्रमुख अंग हैं।

3. विभूति पाद

इस भाग में धारणा, ध्यान और समाधि के संयुक्त अभ्यास तथा उससे संबंधित योगिक अवधारणाओं पर चर्चा की जाती है।

4. कैवल्य पाद

योग-दर्शन के अंतिम लक्ष्य कैवल्य तथा पुरुष और प्रकृति से संबंधित दार्शनिक विचार इस भाग में प्रमुख रूप से सामने आते हैं।


अष्टांग योग का महत्व

पतंजलि योग-दर्शन में अष्टांग योग का विशेष महत्व है। इसके आठ अंग हैं:

  1. यम
  2. नियम
  3. आसन
  4. प्राणायाम
  5. प्रत्याहार
  6. धारणा
  7. ध्यान
  8. समाधि

इन आठ अंगों को योग-साधना के क्रमिक अनुशासन के रूप में समझा जाता है।

यहाँ योग का उद्देश्य केवल शारीरिक अभ्यास तक सीमित नहीं है, बल्कि चित्त की एकाग्रता, आत्मसंयम और आध्यात्मिक उन्नति से भी जुड़ा हुआ है।


पुस्तक की प्रमुख विशेषताएँ

  • महर्षि पतंजलि के योग-दर्शन पर आधारित।
  • Gita Press Gorakhpur द्वारा प्रकाशित संस्करण।
  • Code No. 135
  • हिंदी भाषा में उपलब्ध।
  • हिंदी व्याख्या सहित संस्करण के रूप में सूचीबद्ध।
  • Paperback format।
  • योगसूत्र एवं भारतीय योग-दर्शन के अध्ययन के लिए उपयोगी।
  • भारतीय दर्शन एवं आध्यात्मिक साहित्य का महत्वपूर्ण विषय।
  • योग की दार्शनिक पृष्ठभूमि समझने में सहायक।
  • साधना, ध्यान एवं चित्त-अनुशासन से संबंधित अवधारणाओं के अध्ययन के लिए उपयोगी।

यह पुस्तक किन पाठकों के लिए उपयोगी है?

योग दर्शन विशेष रूप से इन पाठकों के लिए उपयोगी हो सकती है:

  • योग-दर्शन के विद्यार्थी
  • भारतीय दर्शन के विद्यार्थी
  • पतंजलि योगसूत्र का अध्ययन करने वाले पाठक
  • योग एवं अध्यात्म में रुचि रखने वाले पाठक
  • ध्यान एवं साधना के दार्शनिक पक्ष को समझने वाले पाठक
  • संस्कृत एवं भारतीय शास्त्रीय साहित्य का अध्ययन करने वाले विद्यार्थी
  • धार्मिक एवं आध्यात्मिक पुस्तक संग्रहकर्ता
  • योग शिक्षकों के लिए संदर्भ अध्ययन
  • भारतीय दर्शन पर शोध करने वाले विद्यार्थी
  • आध्यात्मिक पुस्तकालयों के लिए

योग दर्शन का अध्ययन क्यों करें?

आधुनिक समय में योग शब्द का प्रयोग अक्सर केवल आसन और शारीरिक व्यायाम के संदर्भ में किया जाता है। लेकिन पतंजलि का योग-दर्शन योग की एक व्यापक दार्शनिक परंपरा को सामने रखता है।

इसमें मन और चित्त की प्रकृति, अनुशासन, ध्यान, वैराग्य और साधना जैसे विषयों पर विचार मिलता है। इसलिए योग के मूल दार्शनिक आधार को समझने के लिए पतंजलि योग-दर्शन का अध्ययन महत्वपूर्ण है।

यह पुस्तक ऐसे पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो योग को केवल शारीरिक अभ्यास के रूप में नहीं बल्कि भारतीय दर्शन और साधना परंपरा के रूप में समझना चाहते हैं।

Weight350 g
Dimensions22 × 14 × 3 cm
Binding

Paperback

Language

Hindi

Publication

Gita Press Gorakhpur

Pages

144

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